7.4.15

गुरू नानक देव

गुरू नानक देव
गुरू नानक देव या नानक देव सिखों के प्रथम गुरू थे। गुरु नानक देवजी का प्रकाश (जन्म) 15 अप्रैल 1469 ई. (वैशाख सुदी 3,संवत् 1526 विक्रमी) में तलवंडी रायभोय नामक स्थान पर हुआ।
सुविधा की दृष्टि से गुरु नानक का प्रकाश उत्सव कार्तिक पूर्णिमा को मनाया जाता है। तलवंडी अब ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है। तलवंडी पाकिस्तान के लाहौर जिले से 30 मील दक्षिण-पश्चिम में स्थित है।
जीवन
नानकदेवजी के जन्म के समय प्रसूति गृह अलौकिक ज्योत से भर उठा। शिशु के मस्तक के आसपास तेज आभा फैली हुई थी, चेहरे पर अद्भुत शांति थी। पिता बाबा कालूचंद्र बेदी और माता त्रिपाता ने बालक का नाम नानक रखा। गाँव के पुरोहित पंडित हरदयाल ने जब बालक के बारे में सुना तो उन्हें समझने में देर न
लगी कि इसमें जरूर ईश्वर का कोई रहस्य छुपा हुआ है।
“जीती नौखंड मेदनी सतिनाम दा चक्र चलाया, भया आनंद जगत बिच कल तारण गुरू नानक आया।”
बचपन से ही नानक के मन में आध्यात्मिक भावनाएँ मौजूद थीं।पिता ने पंडित हरदयाल के पास उन्हें शिक्षा ग्रहण करने के लिए भेजा। पंडितजी ने नानक को और ज्ञान देना प्रारंभ किया तो बालक ने अक्षरों का अर्थ पूछा। पंडितजी निरुत्तर हो गए।नानकजी ने क से लेकर ड़ तक सारी पट्टी कविता रचना में सुना दी। पंडितजी आश्चर्य से भर उठे।
उन्हें अहसास हो गया कि नानक को स्वयं ईश्वर ने पढ़ाकर संसार में भेजा है। इसके उपरांत नानक को मौलवी कुतुबुद्दीन के पास पढ़ने के लिए बिठाया गया। नानक के प्रश्न से मौलवी भी निरुत्तर हो गए तो उन्होंने अलफ, बे की सीफहीं के अर्थ सुना दिए। मौलवी भी नानकदेवजी की विद्वता से प्रभावित हुए।
विद्यालय की दीवारें नानक को बाँधकर न रख सकीं। गुरु द्वारा दिया गया पाठ उन्हें नीरस और व्यर्थ प्रतीत हुआ।अंतर्मुखी प्रवृत्ति और विरक्ति उनके स्वभाव के अंग बन गए। एक बार पिता ने उन्हें भैंस चराने के लिए जंगल में भेजा। जंगल में भैसों की फिक्र छोड़ वे आँख बंद कर अपनी मस्ती में लीन हो गए। भैंसें पास के खेत में घुस गईं और सारा खेत चर डाला। खेत का मालिक
नानकदेव के पास जाकर शिकायत करने लगा।
जब नानक ने नहीं सुना तो जमींदार रायबुलार के पास पहुँचा।
नानक से पूछा गया तो उन्होंने जवाब दिया कि घबराओ मत,उसके ही जानवर हैं, उसका ही खेत है, उसने ही चरवाया है। उसने एक बार फसल उगाई है तो हजार बार उगा सकता है। मुझे नहीं लगता कोई नुकसान हुआ है। वे लोग खेत पर गए और वहाँ देखा तो
दंग रह गए, खेत तो पहले की तरह ही लहलहा रहा था।
एक बार जब वे भैंस चराते समय ध्यान में लीन हो गए तो खुले में ही लेट गए। सूरज तप रहा था जिसकी रोशनी सीधे बालक के चेहरे पर पड़ रही थी। तभी अचानक एक साँप आया और बालक नानक के
चेहरे पर फन फैलाकर खड़ा हो गया। जमींदार रायबुलार वहाँ से गुजरे। उन्होंने इस अद्भुत दृश्य को देखा तो आश्चर्य का ठिकाना न रहा। उन्होंने नानक को मन ही मन प्रणाम किया। इस घटना की स्मृति में उस स्थल पर गुरुद्वारा मालजी साहिब का निर्माण किया गया।उस समय अंधविश्वास जन-जन में व्याप्त थे। आडंबरों का बोलबाला था और धार्मिक कट्टरता तेजी से बढ़ रही थी।
नानकदेव इन सबके विरोधी थे। जब नानक का जनेऊ संस्कार होने वाला था तो उन्होंने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि अगर सूत के डालने से मेरा दूसरा जन्म हो जाएगा, मैं नया हो जाऊँगा, तो ठीक है। लेकिन अगर जनेऊ टूट गया तो?पंडित ने कहा कि बाजार से दूसरा खरीद लेना। इस पर नानक बोल उठे- 'तो फिर इसे रहने दीजिए। जो खुद टूट जाता है, जो
बाजार में बिकता है, जो दो पैसे में मिल जाता है, उससे उस परमात्मा की खोज क्या होगी। मुझे जिस जनेऊ कीआवश्यकता है उसके लिए दया की कपास हो, संतोष का सूत हो,संयम की गाँठ हो और उस जनेऊ सत्य की पूरन हो। यही जीव के लिए आध्यात्मिक जनेऊ है। यह न टूटता है, न इसमें मैल लगता है, न
ही जलता है और न ही खोता है।'
एक बार पिता ने सोचा कि नानक आलसी हो गया है तो
उन्होंने खेती करने की सलाह दी। इस पर नानकजी ने कहा कि
वह सिर्फ सच्ची खेती-बाड़ी ही करेंगे, जिसमें मन को हलवाहा,
शुभ कर्मों को कृषि, श्रम को पानी तथा शरीर को खेत बनाकर
नाम को बीज तथा संतोष को अपना भाग्य बनाना चाहिए।
नम्रता को ही रक्षक बाड़ बनाने पर भावपूर्ण कार्य करने से जो
बीज जमेगा, उससे ही घर-बार संपन्न होगा।
दस सिद्धांत
गुरूनानक देव जी ने अपने अनुयायियों को जीवन के दस सिद्धांत
दिए थे। यह सिद्धांत आज भी प्रासंगिक है।
1. ईश्वर एक है। 2. सदैव एक ही ईश्वर की उपासना करो। 3. जगत
का कर्ता सब जगह और सब प्राणी मात्र में मौजूद है। 4.
सर्वशक्तिमान ईश्वर की भक्ति करने वालों को किसी का भय
नहीं रहता। 5. ईमानदारी से मेहनत करके उदरपूर्ति करना
चाहिए। 6. बुरा कार्य करने के बारे में न सोचें और न किसी को
सताएँ। 7. सदा प्रसन्न रहना चाहिए। ईश्वर से सदा अपने को
क्षमाशीलता माँगना चाहिए। 8. मेहनत और ईमानदारी से
कमाई करके उसमें से जरूरतमंद को भी कुछ देना चाहिए। 9. सभी
स्त्री और पुरुष बराबर हैं। 10. भोजन शरीर को जिंदा रखने के
लिए जरूरी है पर लोभ-लालच व संग्रहवृत्ति बुरी है।

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